Description
सामाजिक बदलाव के इस आधुनिक काल में अनायास ही सहज संवेदनशील गजलों का महत्व बहुत बढ़ गया है, मनुष्य के पास समय नहीं है, वह थोड़े से समय में बहुत कुछ जान लेना चाहता है। साहित्यिक कैप्सूल के रूप में गजलों का प्रयोग आज धड़ल्ले से हो रहा है। ‘धूप बिन दिन’ से गुजरते हुए यह एहसास और स्वस्थ और आकर्षक लगता है। नये वर्ष पर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान एक सामान्य प्रक्रिया है।
‘धूप बिन दिन’ की गजलों से इस धारणा की पुष्टि होती है कि सुकुमार जी एक शुद्ध मानवतावादी संवेदनशील गजलकार हैं जिनमें करुणा, दया, ममता और छल-प्रपंच को भी गजलों में ढालकर साफगोई से कह देने की क्षमता है, जिनमें प्रश्न है, प्रेम है, पीड़ा है और यथार्थ की पारदर्शी अभिव्यक्ति है! श्री सुकुमार की 70वीं वर्षगांठ पर प्रकाशित इस नवीनतम गजल-संग्रह के लिए अनेकानेक बधाइयां एवं आशीष भी।
– डाॅ0 जयनाथ मणि त्रिपाठी
संपादक (अंचल भारती)
साहित्यिक त्रैमासिकी, देवरिया




