Description
एक कवि अपनी भावनाओं पर क़ाबू नहीं पा सकता। यह अगर ज्यादा हो गया हो तो इतना ज़रूर लिख सकता हूँ कि एक कवि अपनी भावनाओं पर इतनी आसानी से क़ाबू नहीं पा सकता। समाज में अनगिनत ऐसे मुद्दे हैं ….घर परिवार में ऐसे कई मसले हैं ….रोज़-रोज़ घटित होने वालीं ऐसी कई घटनाएँ हैं जो कभी आपको गुदगुदाती हैं, कभी रुलातीं हैं, और कभी झकझोर देती हैं। एक कवि हृदय के लिए ये मुद्दे ठीक उस घी की तरह काम करते हैं जो साहित्य रूपी हवन कुंड में पड़ कर हवन के तेज को और ज्यादा प्रज्ज्वलित कर देता है। “बंद पन्ने” में समाज का दर्द है, उपेक्षितों की आह है, शोषितों की बग़ावत है, बंद पन्नों में मेरी भावनाएँ हैं जो पद्यों में प्रस्फुटित हुई हैं। काव्य ज़गत की पंजी में मेरी उपस्थिति मात्र है – “बंद पन्ने”।
-राजीव कुमार झा













